हम उनको उनकी उजरत भी नहीं देते हैं| और वह अपना काम करती रहती हैं| सभी के घरों में जाकर उनको अपनी प्यारी सी किलकारी से हम किसानों के कर्णपालि सहलाकर निंद्रा को भगाती हैं| और ये अपने अंडे-बच्चे को छोड़कर इस निस्वार्थ कार्य को अंजाम देती है|
''प्रकृति की सुंदरता को इस प्रकार बढाती हैं, जैसे कि एक बिंदी मां के माथे पर मां की सुंदरता को बढ़ाती हैं'' प्राकृतिक एक ऐसी किताब है जिसमें सब कुछ समाहित है जैसे कि भगोलिय शास्त्र से लेकर खगोलीय शास्त्र तक की अथाह ज्ञान है| इस प्राकृतिक के सागर में हिलोरे मारने का साहस तो सिर्फ जंगल के जीव-जंतु में हैं| पर ''जो प्राकृत मां के गोद में जो सहज सुख है वह पूरे संसार में कहीं नहीं''|
मैं क्षमा चाहता हूं इन दो लाइनों, के लिए वैसे मैं मां के गोद का अवहेलना नहीं कर रहा हूं मैं तो मां के गोद से वंचित जन को प्राकृत मां के गोद से परिचय करा रहा हूं| इन सब के विपरीत इस आधुनिक युग में शहरी बाबू प्राकृत से नाता तोड़ने में लगे हैं| और ''साथ ही साथ ''प्राकृतिक लेखक का कलम छीन कर अपने कार्य रूपी धनुष के चाप पर चढ़ाकर प्राकृत मां का हृदय छन्नी कर रहे हैं''| इन स्वार्थी शहरी को प्राकृत मां के गोद के बारे में नहीं पता है।
अगर हमको जीवन के इस दौर में प्रतिभाग नहीं करना हो तो मैं प्राकृत मां के गोद में ही अपना सारा जीवन व्यतीत करूँगा। और ऐसा लगता है कि शहरी बाबू अपना पैतृक ज्ञान को भुला चुके हैं कि अगर हम प्राकृत मां के सम्पर्क में
रहे तो''हमारा जीवन जून की चिलचिलाती धूप से वसंत का सुहाना सफर सा हो जाता है''। ये शहरी बाबू लोग तो यह भी जानने की अभिलासा नहीं रखते हैं कि ''मैं आज जिस स्तर पर हूं उसका उत्तरदायित्व कौन है, अगर प्रत्यक्ष रूप से देखा जाए तो हमारी मां और अप्रत्यक्ष रूप से हमारी प्रकृति मां''।
''हमको यह कहने में ऊर्जा का अनुभव हो रहा है कि मैं इन स्वार्थी शहरी बाबू की श्रेणी में होने के बावजूद भी हमको प्राकृत की फुलझड़ी जैसे पखेरू के सौरभ को पसंद करता हूं 'और हमको ऋतु राज वसंत के समय का पीला सागर, और सुबह के समय गांव में भगवान भास्कर की लालिमा के साथ फसलों का लहराना और उसकी खुशबू जो हमारी मस्तिक के लिए साबुन के भांति कार्य करती है''। इसीलिए मैं अक्सर
वसंत ऋतु के आगमन पर अपने मामा के घर अवश्य जाता हूं, और मेरी प्यारी मामी का कहना है कि तुम्हारा आगमन यानी कि वसंत का आगमन।
''यहां भगवान भास्कर अपनी लालिमा को बिखेर कर बाट को स्पष्ट करते हैं और छोटे भाई पवन बहन फसल की खुशबू को साथ में समेटे हुए बाट को पात रूपी आभूषण से तैयार कर नववधू रूप देकर किसान के लिए आंख बिछाए बेसब्री से इंतजार करती हैं''।
दोपहर के समय मंद मीठी हवा चलती रहती है।
और ये मीठी हवा बचपन से लथपथ बच्चों के सर को सहलाकर आगे बढ़ जाती हैं। भगवान भास्कर और भाई पवन और बहन खुशबू का संबंध टूट जाता है, जैसे कि ''चांद का चांदनी रात से'' यह तीनों को गोधुल तक भरत-राम की तरह मिलाप अब फिर से करेंगे। और यही बिछडन के कारण ''किसान भाइयों का पेट अंगूर से किशमिश हो जाता है और इसे पुनः अंगूर बनाने के लिए, हरी चूड़ियां खनक ती हुई पकवान युक्त थाल किसान भाइयों के पेट तक पहुंचता है''।
कुछ अवधि और किसान भाई श्रम करते हैं। उसके बाद धरती मां जो ढाढस देती है उसमें किसान जन खुश होकर त्यौहार का आयोजन करते हैं और यह त्यौहार एक गांव स्तर पर मनाया जाता है इस त्यौहार में सभी घरों से थोड़ा-थोड़ा अनाज आता है और सात प्रकार के सब्जी इकट्ठा करते हैं इस दिवस बच्चे नए-नए कपड़े पहनते हैं, और माथे पर बहन के द्वारा हरे रंग का टीका लगाया जाता है और महिलाएं हरी-हरी चूड़ियां और नए-नए कपड़े पहन कर घर के बाहर का काम संभालती हैं इसके बाद गांव में किसी एक स्थान पर बैठकर अपने मनोरंजन के लिए गायन और भजन तथा नृत्य करती हैं। और इधर पुरुष अपने पैतृक पोशाक और हरे रंग का साफा पहन कर रसोई घर में प्रवेश करते हैं। और सामूहिक भंडारा करते हैं। और फिर इसके बाद गोधुल के समय महिलाओं को पुरुष झूला झुलाने ले जाते हैं। इसके बाद सभी एक स्थान पर बैठकर अपने बेटी के द्वारा परोसा गया भोजन का सेवन करके एक नए उल्लास के साथ नए योजना का श्रीगणेश करते हैं। और इस संकल्प के साथ इस त्यौहार का अंत होता है।
और फिर जब मई जून का महीना आता है इधर कुछ दिवस भगवान भास्कर आग बबूला हो लेते हैं इन दिनों। रेत धूप से चमचमाती हुई प्रतीत होती है, रेत पर एक कदम भी चलना भारी हो जाता है इसके बावजूद भी कुछ गोवाला अपने गोवालो के साथ नदी के तट पर दलील से बातें कर रहे थे।
भाई मैं तो ठंडी छाया की छांव में बैठकर फलों के राजा के साथ चुंबन कर रहा था। फलों के राजा पर विजय प्राप्त करते-करते जून का अंत हो जाता है।
और फिर वृक्षों को झकझोर ते हुए हवा का झोंका
आता है और पंछीयो का पंख साध कर रख देता है और फिर प्राकृत मां के गोद को हरियाली करने के लिए पहली वर्षा का शुरुआत होता हैं, वर्षा के बाद सारा वातावरण साफ हो जाता है ''सब की कहानी शुरू हो जाती है संदेशों का आदान-प्रदान होने लगता है, पछिया अपने-अपने घोसले से निकलकर अपने पंख फड़फड़ाते हैं और बदन का सारा पानी झड़ते हैं और एक दूसरे का गात साफ करते हैं और फिर चहचहा कर एक झुंड में एक वृक्ष से दूसरे वृक्ष पर जाती हैं जैसे कि वह किसी का प्रेम संदेशा लिए फिर रही है। और कुछ चिड़िया अपने बच्चे को आसमान के पार इंद्रधनुष की सैर करा रही हैं और फिर तभी अचानक एक काला बादल आता है, और शाम सा कर देता है। और हल्की-हल्की होकर बारिश शुरू हो जाती है इस वक्त सभी के घरों में पकौड़ी छान रहे होते हैं। इन्हीं बीच बच्चे अपनी मां के नजरों से बच के खुले आसमान में आ जाते हैं।
इन्हीं सभी के बीच एक हस्ट पुष्ट सौरभ किशोर शहर से आने वाली सड़क को खड़े-खड़े ना जाने किस के प्यार के संदेशा का इंतजार कर रहा है। और साथ ही प्राकृत मां का लाल पुष्प लिए बेसब्री से शहर की ओर निहारे जा रहा है। यह देखकर हमको ऐसालगता है कि अब हमको भी शहर की कहानी पकड़नी चाहिए।
-Rohit Kumar Prajapati (JNV Shrawasti)
Class-9th
शब्दों का बेहतरीन चयन एवं प्रकृति के बारे एक नए दृष्टिकोण से देखने को उत्साहित किया। बहुत बढ़िया
ReplyDeleteThanks bhai.
DeleteBahut badiyaa....
ReplyDeleteबहुत अच्छा लिखा है। मुझे यह पसंद आया।
ReplyDeleteSuperb bhai 👌
ReplyDeleteAti uttam lines👌😍
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